कथा से, गद्य से

कविता से, पद्य से

दोहे से, छंद से

चौपाई से, निबंध से




तुमने समझाया क्या है प्यार......




और.....




तर्क में, ज़ज्बात में

यथार्थ में, खयालात में

ज़र्रे में, कायनात में

स्पर्श में, आघात में

तन्हाई में, साथ में

रौशनी में, रात में

तुम्हारी हर एक बात में




मैंने पाया क्या है प्यार....




और.......




हर युग में, हर काल में

लम्हो में, साल में

निरंतर कभी, कभी अंतराल में

हर अवस्था, हर हाल में




तुमने रटाया क्या है प्यार.....




पर फिर भी




समय की धार

जो करती वार

उल्फत होती तार तार

हालातो से हो लाचार

मैं भूलता हूँ बारम्बार




कि क्या है प्यार??

कि क्या है प्यार??

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