तमाम सफर किया है हमने फासले भी तय किये हैं हौसले के थकने से पहले क्यों न कहीं अब बैठ जायें शाम है होने को आई धुँधला धुंधला सा है मंज़र दिन के ढल जाने से पहले क्यों न एक दिया जलायें हर एक बात दिल की मानी जी भर धड़के साथ इसके इसीकी हमेशा सुनते आये क्यों न अब इसे समझायें कहते थे लोग अक्सर हम ही अनसुनी सी करते कभी हम भी फ़ना होंगे क्यों न अब मान भी जाएं ये बाते गहरी गहरी उलझन सी हो रही है खुशनुमा हो जाए मौसम क्यों न एक जाम बनाएं
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