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Showing posts from October, 2022
तमाम सफर किया है हमने  फासले भी तय किये हैं   हौसले के थकने  से पहले  क्यों न कहीं अब बैठ जायें  शाम है होने को आई  धुँधला धुंधला सा है मंज़र  दिन के ढल जाने से पहले  क्यों न एक दिया जलायें  हर एक बात दिल की मानी  जी भर धड़के साथ इसके  इसीकी हमेशा सुनते आये  क्यों न अब इसे समझायें  कहते थे  लोग अक्सर  हम ही अनसुनी सी करते  कभी हम भी फ़ना होंगे  क्यों न अब मान भी जाएं  ये बाते गहरी गहरी  उलझन सी हो रही है  खुशनुमा हो जाए मौसम  क्यों न एक जाम बनाएं