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Showing posts from February, 2014
एक सवाल था अकेला था अलबेला था अपने साथी अपने हमनफ़स अपने जवाब की  तलाश में घूम रहा था एक ही धुन थी उसको पा लेना उसी में झूम रहा था कोशिशो को लगातार बार बार नाकामी तो मिलती थी पर जवाब नहीं मिल रहा था थक गया था अब वो बदन भी टूट रहा था अभी तक जकड़े हुए था हौसला शायद अब कुछ हिस्सा छूट रहा था धीरे धीरे रास्ते में कुछ और लोग मिले सब थके से निराश से होश सबके खस्ताहाल थे वो भी कुछ ढूंढ ही  रहे थे वो सब भी सवाल थे  पहले एक सवाल था........ अकेला था ....... अब कई सवाल थे.……  मेला था.……  जवाब का अब भी दूर दूर तक कुछ पता न था.…………………   
सुन लो क्या कहती है,   मगर याद ये  रखना नहीं माननी कोई भी,   इसकी बात है है निशा ये मायावी,   राका है ये सूने सन्नाटे से सनी हुई,   एक रात है कस कर शिकंजा शक का,   तुम्हारी सोच पर छल्ला बन छलावों का,   तुम  पर गिरेगी स्याह रह जाएंगी सारी,   अनमनी आनाकानियां उजले फैसलों में भी तुम्हारे,    ये स्याही  भरेगी उठते ही शिकायत कर देना,   सवेरे से जाकर कैसे ये रोज़  लगाती रात,  घिनौनी घात है यदि चाहो तो कर देना तुम   माफ़ भी इसको फितरत के फंदे में फंसी,   आखिर बेचारी रात है  
जान लगा देता  हूँ,   मैं जब हूँ बुनता जूनून है मेरा,   और मेरी इबादत भी है लगना लगन से,   पूरा इसी में रम  जाना यही तरकीब मेरी,   अब तो यही आदत भी है ऐसे ही तुमभी,   बुनकर देखो एक  रिश्ता यार मेरे लगता है,   बात बन जायेगी टूटेगा नहीं,   अगर मान लो टूट भी जाये  दावा है मेरा, गाँठ नज़र नहीं आएगी 
खोने पर मायूसी कैसी,  बिन खोये पाना नामुमकिन गर पाने की हो तमन्ना,  कुछ  तो खोना चाहिए दोस्त, दुआ, दवा, हौसला,  सब के सब नाकाम रहे ज़ख़म  भरने के लिए एक ज़खम तो होना चाहिए 
प्रश्न : बूढ़े शरीर (टूटे गिटार ) और आत्मा (धुन) में यदि संघर्ष होगा तो क्या होगा? उत्तर: मेल बेमेल होगा जब तब  ऐसी समस्या आएगी बात बिलकुल नहीं बनेगी या बिलकुल ही बन जायेगी अगर युद्ध मानो  तो.…… होना है क्या अब शंखनाद होगा  बजेगी दुंदुभि कर्कश संवाद  होगा रुदन की  ध्वनियां दृश्य विचित्र होगा भवानी का क्रोध शंकर का नृत्य होगा अगर संगीत मानो तो…… होना है क्या जीवन गीत होगा बूढ़ा  गिटार भी धुन का मीत  होगा साथ देगा जब तक सांस आबाद होगी उसके बाद तो क्या कहने धुन  आज़ाद होगी
सब पहचानते हैं तुमको,   रखती हो ख़याल तुम भी हर कोई तुम्हे चाहता,   तुम मशहूर भी बहुत मुमकिन नहीं सिमटी रहे,   चारदीवारी के भीतर पहुंचेगी तुम्हारी शोहरत,   दूर भी बहुत नयी पुरानी  हर चीज़,   जानती है तुमको है मलाल इसी बात का,   हमें  कोई जानता नहीं मैं चीख चीख कर बोलूं,   जब अपने नाम को सब देखते तो हैं,   कोई पहचानता नहीं क्या बात करूँ मैं औरों की,   पतलून भी मेरी दो तीन महीनों में,   मुझको भूल जाती है  ज़रा सी नाप क्या,    बदली कमर की कसती शिकंजा, तकलीफ देती है,   बेहद सताती है दस पांच कदम ज्य़ादा,   रोज़ाना की  सैर से गर आगे बढ़ जाऊं,   तो जूते भूल जाते हैं पुचकारता हूँ प्यार से,   'मेरे काले घोड़ों ' शिद्दत से काटते हैं,   छाले  फूल जाते हैं अपना हुआ न आँगन,    न धूप-छाँव ही ना तो अपना कमरा,    न चारदीवारी है पहचान को गुमनामी,  औ  गुमन...
आसमान  बिछाकर के तुम उस पर ज़मीन जमाती हो पहाड़ उगते हैं उस पर फिर तुम नदी भगाती हो सूरज जलाकर, बोती बादल फिर इंद्रधनुष फहराती हो तुम तस्वीर बनाती हो और यह कविता बन जाती है हम पढ़नेवाले हैं जब पढ़ते अद्भुत तस्वीर नज़र आती है है असमंजस में डाला तुमने यह कैसा गड़बड़झाला है तस्वीर है सुन्दर कविता भी अंदाज़ बड़ा निराला है
बस इनका ही सहारा था आँसू ही सच्चे साथी थे वाज़िब था तन्हाई में पर क्यों हैं ये अब साथ में आँसू  दिख जाते तो अक्सर थे पर आँखों में ही रह जाते थे  पहले थे गिरते कभी कभी अब  हर दिन औ हर रात में आँसू  बन गई है  इन मोतिओं से  गहना मेरा अब, खामोशी  बात तो अब है हो नहीं पाती  लेकिन हैं हर बात में आँसू  सूख जायेंगे ये सब सारे  एक दिन चुक ही जायेंगे  दिखलाई तो नहीं देंगे पर  बहेंगे खयालात में आँसू 
We all start our journey having the candid innocence of childhood.  It is almost certain that there would be encounters with the 'grey' or 'black' in our path. Most of us resist for some time in the beginning but ultimately our defiance falls apart and we become part of what we never wanted to start with. It is so hard to keep on fighting against the mightiness of evil than to resign and choose the path of least resistance.......inspite of knowing this we fall for it again and again...... कोशिशें तमाम कर लीं, कम्बख़त जाता नहीं आ पसरा है अँधेरा, मेहमान बनकर इन दिनों कुछ  था सुनता मेरी  भी, दो बातें मानता भी था अब अपनी चलाता है अँधेरा, फरमान बनकर इन दिनों उखड़ रही है साँस, नब्ज़ भी टूटी टूटी है मरने देता नहीं अँधेरा, एहसान बनकर इन दिनों आदत सी पड़ गयी है इसकी, हबीब बन गया है ये साथ रहता है अँधेरा, मेरी जान बनकर इन दिनों
बस बहानों से अब तौबा, आये कल और काम शुरू चैन अभी तो ले लेने दो, तबियत ज़रा नासाज़ है 
गर पूरी होना चाहो तो, कोई और ठिकाना ढूंढ़ लो हरदम रही हो, फिर रहोगी, अधूरी मुझमें ऐ हसरतों 
There are so many memories from my G B Pant days that picking one or two from this Pandora’s box is - mushkil hi nahi namumkin hai .  I still go back into those days and derive pleasure through nostalgic tools. Some memories which I would like to share today mainly revolve around the magical room which was fortunately assigned to us as duty room. It’s entrance was in the corridor leading to the 16 bedded ICU. We tried our best to steal some time from our schedule to just sneak into that room and engage ourselves into the ongoing discussions about everything one can think of.  There were 2 beds and few chairs in there but effectively only one bed was available for most of the times as one of my colleague Ram Singh used to transform into Aram Singh after entering the magical room and not respecting the concept of day and night used to slip into deep slumber filling the room with pleasant sonic vibrations. We admired Aram Singh not only for his carefree attitude but also for ...
ताज़ा ताज़ा था सबेरा ज़िंदादिल उजाला था बात बात  पर होता हंसना हर अरमान निकाला था  घंटे बीते ,समय कुछ निकला आ गयी दोपहर अलसायी सी ऊपर नीचे, गर्मी राहत  थी धूप पर बदली छायी सी वक़्त का चलना ज़ारी है अब समय बड़ा ही भारी है चलो समेटो जल्दी जल्दी अब शाम होने वाली है ये जिया है हमने दिन भर वो सिर्फ झांकी सा रह जायेगा माना  पाया काफी कुछ  पर कुछ बाक़ी  सा रह जायेगा घिरेगा  अँधेरा रात होगी कल तक ना कोई बात होगी हमारी भी आँखे बंद होंगी अंत में सो ही जायेंगे पर अभी तो आँखे खोल लो सिर्फ शाम होने वाली है
कथा से, गद्य से कविता से, पद्य से दोहे से, छंद से चौपाई से, निबंध से तुमने समझाया क्या है प्यार...... और..... तर्क में, ज़ज्बात में यथार्थ में, खयालात में ज़र्रे में, कायनात में स्पर्श में, आघात में तन्हाई में, साथ में रौशनी में, रात में तुम्हारी हर एक बात में मैंने पाया क्या है प्यार.... और....... हर युग में, हर काल में लम्हो में, साल में निरंतर कभी, कभी अंतराल में हर अवस्था, हर हाल में तुमने रटाया क्या है प्यार..... पर फिर भी समय की धार जो करती वार उल्फत होती तार तार हालातो से हो लाचार मैं भूलता हूँ बारम्बार कि क्या है प्यार?? कि क्या है प्यार??
बचपन में बड़ा गुमान था खुद पर … चाँद मेरे  साथ साथ चलता था… जो मैं चलता था तो वो चलता था … समय से हाथापाई होती रही… अब गुमान नहीं है, शुक्रगुज़ार हूँ मैं.… शुक्रिया ओ मेरी साँस … जो तू चलती है तो मैं चलता हूँ..... 
अब अकेला  हूँ बहुत, कोई  मेरे साथ नहीं है. मौजूद तो  हर शह यहाँ, पहले वाली वो बात नहीं है.. बड़ा सा आसमान है, जड़े हैं चाँद तारे भी, ऊपर मगर प्यार भरा मेरी माँ का हाथ नहीं है।
सुनी है एक खबर मैंने.. तुम्हारे आने की..सच में तुम्हारे आने की.. बिलकुल भी विश्वास नहीं होता .. तुम आओगे मेरे शहर में.. मेरे मकान वाली गली में.. तुम्हे पहचान लेंगे सभी मकान और गली के पेड़ सारे.. आदत हो गयी है इनको भी .. साथ मेरे.. बाट जोहने की ...तुम्हारी तुम्हे भी आज करने होगा ..इंतज़ार मुझे अपनी चूनर खोज कर पहननी है......ख्वाहिशो की कहीं खो गयी है  वोह इंतज़ार कहीं लंबा न हो जाये.. आज मरम्मत भी तो करवानी है  अपने सारे  गहनो  की ......अरमानो की टूट गए हैं वोह डर भी लग रहा है.. कहीं ऐसा न हो मैं तुमसे मिल ही न पाऊँ टीका ही लगाती रह जाऊं .. अपने माथे पर......वज़ूद का बिलकुल मिट गया है वोह अरे... देखो नाराज़ मत हो .. बिलकुल नाराज़ मत हो तुम भी तो जानते हो.. जानती हूँ मैं भी.. और तो और ये मकान और पेड़ भी जानते हैं.. हम  मिल नहीं पाएंगे.. वजह मैं नहीं...ये खबर है.. बिलकुल झूठी है.. तुम नहीं आओगे......कभी...कभी... नहीं आओगे.