ताज़ा ताज़ा था सबेरा
ज़िंदादिल उजाला था
बात बात  पर होता हंसना
हर अरमान निकाला था
 घंटे बीते ,समय कुछ निकला
आ गयी दोपहर अलसायी सी
ऊपर नीचे, गर्मी राहत
 थी धूप पर बदली छायी सी
वक़्त का चलना ज़ारी है
अब समय बड़ा ही भारी है

चलो समेटो जल्दी जल्दी
अब शाम होने वाली है



ये जिया है हमने दिन भर वो
सिर्फ झांकी सा रह जायेगा
माना  पाया काफी कुछ  पर
कुछ बाक़ी  सा रह जायेगा
घिरेगा  अँधेरा रात होगी
कल तक ना कोई बात होगी
हमारी भी आँखे बंद होंगी
अंत में सो ही जायेंगे

पर अभी तो आँखे खोल लो
सिर्फ शाम होने वाली है





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