सब पहचानते हैं तुमको,   रखती हो ख़याल तुम भी
हर कोई तुम्हे चाहता,   तुम मशहूर भी बहुत

मुमकिन नहीं सिमटी रहे,   चारदीवारी के भीतर
पहुंचेगी तुम्हारी शोहरत,   दूर भी बहुत

नयी पुरानी  हर चीज़,   जानती है तुमको
है मलाल इसी बात का,   हमें  कोई जानता नहीं

मैं चीख चीख कर बोलूं,   जब अपने नाम को
सब देखते तो हैं,   कोई पहचानता नहीं

क्या बात करूँ मैं औरों की,   पतलून भी मेरी
दो तीन महीनों में,   मुझको भूल जाती है

 ज़रा सी नाप क्या,    बदली कमर की
कसती शिकंजा, तकलीफ देती है,   बेहद सताती है

दस पांच कदम ज्य़ादा,   रोज़ाना की  सैर से
गर आगे बढ़ जाऊं,   तो जूते भूल जाते हैं

पुचकारता हूँ प्यार से,   'मेरे काले घोड़ों '
शिद्दत से काटते हैं,   छाले  फूल जाते हैं

अपना हुआ न आँगन,    न धूप-छाँव ही
ना तो अपना कमरा,    न चारदीवारी है

पहचान को गुमनामी,  औ  गुमनामी को पहचान
लगता है इस जनम में,   यही किस्मत हमारी है

नहीं चाहिए कोई शोहरत,    ना जाने कोई मुझे
पर एक दुआ खुदा मेरी,   कबूल हो अभी

अपने मेरे हो के रहें,   और मैं अपनों का
उन्हें पह्चानने में मुझसे,   कोई भूल ना हो कभी

Comments

Popular posts from this blog