जब होती नहीं मयस्सर, लड़खड़ाते हो ज़मीन पर डगमगाते भी हो बिलकुल, रिन्दों की तरह सागर में उतरते ही, चढ़ते हो आसमान में हवा से पेंच लड़ाते हो, परिंदो की तरह
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Showing posts from April, 2014
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है पता, नहीं बदलोगे ज़िद भी रहेगी क़ायम हक़ भी नहीं है तुम पर अब मैं ही बदल रहा हूँ हरदम गिरा हुआ था अब उठने सा लगा हूँ तुम्हे दिखती है लड़खड़ाहट पर मैं संभल रहा हूँ लो तुम भी लुत्फ़ ले लो तमाशे तुम्हे पसंद हैं तुम धू धू जल रहे हो और मैं उबल रहा हूँ तेरी आरज़ू ने भींचा तेरी ख्वाहिशों ने बाँधा ओ जिस्म! गिरफ्त से तेरी अब मैं निकल रहा हूँ I have written few lines on perpetual tussle between mundane desires of physical body and intense pining for emancipation by sublime soul.....
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Many times you underestimate..... Sometimes you underestimate to be embarrassed..... Existence is never insignificant..... बहुत छोटी सी अदनी सी चीज़ लगे थे तुम मंज़िल की तो बात छोड़ो पहुँच तुम्हारी सीढ़ी तक भी होगी इस पर भी शक था मुझे छोटे से तुम छोटे छोटे से कदम तुम्हारे वोह भी ज़मीन पर मन ही मन हँसता मैं कुलांचे भरता रहा हवा में आज परेशान इस बात पर नही .... तुम पहुँच गए..... हैरान हूँ … तुमसे ही पूछ रहा हूँ पहुंचा कैसे जाता है? आज भी तुम चीज़ हो... पर पहुंची हुई
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एक बात बताओ तुम इतना मीठा कैसे बोल लेते हो? सुन्दर सुन्दर,तराशे हुए, ठंडी ठंडी , मिठास लिए बोल लाते कहाँ से हो तुम? चाहता, तो मैं भी हूँ बोलूँ, तो तुम्हारी तरह से हो जाएँ सब खुश तारीफ़ सुनकर अपनी पर ऐसा होता कभी नहीं मुँह जब भी खोलता हूँ निकलती है भड़ास ही वो भी तीखी, सुलगती हुई तुम्हे पता है.… मैंने एक बार कुछ शब्दों को मीठी चाशनी में हफ्तो डाल कर रखा .... इस्तेमाल करना चाहा जब तो सब गल गए थे शायद कुछ नालायक बच भी निकले थे सौदा कर लिया था उन्होंने मिठास के बदले अपना अर्थ चाशनी में घोल बैठे थे किसी काम के नहीं बचे थे वो बच गई थी तो कड़वाहट ज़बान में मेरी .… लेकिन सुना है मैंने सच भी कड़वा होता है है न... पर एक बात बताओ तुम इतना मीठा कैसे बोल लेते हो?
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सुबह उठ कर जब बाहर नज़र डाली मैंने सफ़ेद ठंडी बर्फ पर तो एक बार ये ख़याल आया कि तुम्हारी शख्सियत काफी कुछ बर्फ़ के जैसी है न कहीं हौसलों की गरमी और न जिंदादिली की आँच ही है तुम में तमन्नाएँ रही होंगी रंगो से भरी कभी अभी तो सब फीकी पड़ चुकी हैं बेरंगी हैं बिलकुल अब अंदर नहीं है ना सही पर बाहर से तपिश पाकर तो बर्फ भी पिघल जाती है मेरा सोचना ग़लत था मेरे दोस्त तुम बर्फ से भी कहीं गए गुज़रे हो