सुबह उठ कर जब बाहर
नज़र डाली मैंने
सफ़ेद ठंडी बर्फ पर
तो एक बार ये ख़याल आया
कि तुम्हारी शख्सियत
काफी कुछ बर्फ़ के जैसी है
न कहीं हौसलों की गरमी
और न जिंदादिली की आँच ही है तुम में
तमन्नाएँ रही होंगी रंगो से भरी कभी
अभी तो सब फीकी पड़ चुकी हैं
बेरंगी हैं बिलकुल
अब अंदर नहीं है ना सही
पर बाहर से तपिश पाकर
तो बर्फ भी पिघल जाती है
मेरा सोचना ग़लत था मेरे दोस्त
तुम बर्फ से भी कहीं गए गुज़रे हो
नज़र डाली मैंने
सफ़ेद ठंडी बर्फ पर
तो एक बार ये ख़याल आया
कि तुम्हारी शख्सियत
काफी कुछ बर्फ़ के जैसी है
न कहीं हौसलों की गरमी
और न जिंदादिली की आँच ही है तुम में
तमन्नाएँ रही होंगी रंगो से भरी कभी
अभी तो सब फीकी पड़ चुकी हैं
बेरंगी हैं बिलकुल
अब अंदर नहीं है ना सही
पर बाहर से तपिश पाकर
तो बर्फ भी पिघल जाती है
मेरा सोचना ग़लत था मेरे दोस्त
तुम बर्फ से भी कहीं गए गुज़रे हो
Comments
Post a Comment