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Showing posts from January, 2016
कुछ लोग आने लगे हैं अभिनय तुम्हारा देखने क्यों न आज कुछ अलग करो तुम किरदार को अपना पूरा बदल डालो.... मायूसियत को करो रुखसत दर्द को कर दो दफा और मेरी मानो तो  आंसुओं को भी चेहरे से पूरा हटा लो.... मत करो परवाह कि 'कोई' अभी आया नहीं देर हो जाती है अक्सर तुम ही हंस कर तब तक क्यों न तमाशे को सम्भालो .... मंजे हुए फनकार हो तुम तुम्हारा अंदाज़ निराला है बहुत हुआ अब चलो मंच पर पर्दा उठने वाला है कुछ लोग आने लगे हैं अभिनय तुम्हारा देखने
और उधर सूरज हताश है अपने आप से सदियों से सुलगते रहने के विचित्र इस अभिशाप से आ गया है तंग वो इस तेज से,  प्रताप से अक्सर है सूरज सोचता चाँद बेहद खुशनसीब है दिखने में सुन्दर है ही चांदनी भी करीब है उधर चाँद क्या उसे भी कुछ पता होगा ?..... सूरज खुद को चांदनी  में भिगोना चाहता है और अगले जनम में खुद चाँद होना चाहता है
पता नहीं कैसी जादुई ट्यूनिंग करी है बनानेवाले ने हर  बार लगता है..... बस ये मुसीबत जो सामने खड़ी  है अगर टल  जाए तो बात बन जाये जान लगाकर तमाम कोशिशों के बाद बात बनती दिखती है पर हाथ में आती है एक नई परेशानी जो मंद मंद मुस्कराती है और मन ही मन दाद देती है... मान गए  बनानेवाले कैसी जादुई ट्यूनिंग करी है इसको हर  बार लगता है ....