है पता, नहीं बदलोगे
ज़िद भी रहेगी क़ायम
हक़ भी नहीं है तुम पर
अब मैं ही बदल रहा हूँ

हरदम गिरा हुआ था
अब उठने सा लगा हूँ
तुम्हे दिखती है लड़खड़ाहट
पर मैं संभल रहा हूँ

लो तुम भी लुत्फ़ ले लो
तमाशे तुम्हे पसंद हैं
तुम धू धू जल रहे हो 
और मैं  उबल रहा हूँ 


तेरी आरज़ू ने भींचा 
तेरी ख्वाहिशों ने बाँधा 
ओ जिस्म! गिरफ्त से तेरी 
अब मैं निकल रहा हूँ 

I have written few lines on perpetual tussle between mundane desires of physical body and intense pining for emancipation by sublime soul.....

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