सुन लो क्या कहती है,   मगर याद ये  रखना
नहीं माननी कोई भी,   इसकी बात है
है निशा ये मायावी,   राका है ये
सूने सन्नाटे से सनी हुई,   एक रात है

कस कर शिकंजा शक का,   तुम्हारी सोच पर
छल्ला बन छलावों का,   तुम  पर गिरेगी
स्याह रह जाएंगी सारी,   अनमनी आनाकानियां
उजले फैसलों में भी तुम्हारे,    ये स्याही  भरेगी

उठते ही शिकायत कर देना,   सवेरे से जाकर
कैसे ये रोज़  लगाती रात,  घिनौनी घात है
यदि चाहो तो कर देना तुम   माफ़ भी इसको
फितरत के फंदे में फंसी,   आखिर बेचारी रात है
 

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