सुनी है एक खबर मैंने..
तुम्हारे आने की..सच में तुम्हारे आने की..
बिलकुल भी विश्वास नहीं होता ..
तुम आओगे मेरे शहर में..
मेरे मकान वाली गली में..
तुम्हे पहचान लेंगे सभी मकान
और गली के पेड़ सारे..
आदत हो गयी है इनको भी ..
साथ मेरे..
बाट जोहने की ...तुम्हारी
तुम्हे भी आज करने होगा ..इंतज़ार
मुझे अपनी चूनर खोज कर पहननी है......ख्वाहिशो की
कहीं खो गयी है वोह
इंतज़ार कहीं लंबा न हो जाये..
आज मरम्मत भी तो करवानी है
अपने सारे गहनो की ......अरमानो की
टूट गए हैं वोह
डर भी लग रहा है..
कहीं ऐसा न हो मैं तुमसे मिल ही न पाऊँ
टीका ही लगाती रह जाऊं ..
अपने माथे पर......वज़ूद का
बिलकुल मिट गया है वोह
अरे... देखो नाराज़ मत हो ..
बिलकुल नाराज़ मत हो
तुम भी तो जानते हो..
जानती हूँ मैं भी..
और तो और ये मकान
और पेड़ भी जानते हैं..
हम मिल नहीं पाएंगे..
वजह मैं नहीं...ये खबर है..
बिलकुल झूठी है..
तुम नहीं आओगे......कभी...कभी... नहीं आओगे.
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