Compensatory Enrichment of  'the ghazal'


बेहद बासी और थकी थी ग़ज़ल
उसमे कोई जान नहीं थी
फिर मोहब्बत हुई
चाहत परवान लेने लगी
एक बार फिर से
चाहत को मंज़िल ना मिली
ख्वाहिशें पूरी न हुईं
चाहत ने फिर दम तोड़ दिया
चाहत ने 'जान' दे दी
और ग़ज़ल में 'जान' फूँक दी
ग़ज़ल शानदार हो गई
ग़ज़ल 'जान' दार हो गई

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