जब से होश सम्भाला
पाया यही
तुम कुछ बताना
चाहती हो मुझे
कुछ समझाना
चाहती हो

कभी तो
तुम्हारी परछाईं
में भी  पैनापन दिखता था
तल्खी और चुभन थी एहसास में
कभी तुम ही
धुंधली हो जाती थीं
धुआँ धुँआ  सा था
तुम्हारे अंदाज़ में
चंद अल्फ़ाजो में
समेटे थीं
जाने कितने राज़
हमेशा चुप्पी ही सुनाई पड़ी
तुम्हारी आवाज़ में
पर तुम भी हो अजीब
बताना भी चाहती हो
वो भी पहेली बन कर
कोशिशो के बावज़ूद
तुम रहीं 
दूर..... मेरी समझ से दूर.....  बहुत दूर 

मुझे याद है
मैं बदला, मौसम बदला
तुम भी बदलीं

तरन्नुम और तुक की
शॉल पहनकर
अपने अंदर मौसीकी भर ली
कई नाज़ुक जज़्बात भरे
हो मुझे
समझने में आसानी
ऐसे भी तुमने  कुछ
हसीन हालात भरे
खूबसूरत और दिलकश
ग़ज़ल बनकर
फासलों में भरी नज़दीकियाँ
सफ़ेद कागज़ पर मेरे दिल के
तुमने चमक भरी
कई रंगीन दिन अो रात भरे
रही जहाँ तक तुम्हे
जानने की बात तो
तुम वहीँ रहीं
दूर..... मेरी समझ से दूर.....  बहुत दूर 

हार न मानी तुमने
खुद को विस्तार दिया
बारीकियां भी
दिख सकें
तकलीफ के बिना
तुमने खुद को
ऐसा आकार  दिया
हर मोड़ को
रोचक तो बनाया ही
हर दिन उसमे
एक नया
किरदार दिया
आज बहुत ही उम्दा
उतार चढ़ाव भरी
बेहतरीन
से भी बेहतर
एक कहानी तुम
पर हैरान इसी बात पर
हूँ ऐ जिंदगी
आज भी हो तुम
दूर..... मेरी समझ से दूर.....  बहुत दूर 


 


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