मैं, हाँ, मैं ही जवाब हूँ ... शांत हूँ गम्भीर हूँ
निराला हूँ मैं ... बड़ा लाजवाब सा भी
पूरा हूँ सच मैं ... हकीकत में अव्वल
परियों के शहर का ... रंगीन ख्वाब सा भी
मैं साथ ही हूँ जन्मा ... अपने सवाल के और
साथ ही हूँ रहता ... साथ ही बड़ा हुआ
दानिशवरी* ने आकर ... जब उसको पुकारा
मुझे पहचानना वो भूला ... अचानक उठ खड़ा हुआ
अब इधर उधर खोजता ... देखो थका जा रहा है
आवाज़ दे रहा है ... मुझे बदहवास होकर
है बाहर ही ढूंढता ... न झांके है भीतर
हैरान मैं, न पाता मुझे ... मेरे इतने पास होकर
…………………………………………
आज इस मुकाम पर... कुछ तो हुआ है
एकदम से, अचानक से ... क्या ऐसा घटा है
पर्दा हमारे बीच में ... जो हमेशा ही पड़ा था
बिलकुल भी नहीं है … एकदम से हटा है
मैं, तुम की छुट्टी … न मेरा, न तेरा
हम का अहम् का ... मूल्य नहीं अब रह गया
द्वन्द पूरे जीवन का ... जो जमता जा रहा था
एक पल में पिघला ... एक पल में बह गया
मुश्किल से मिले हम ... मिलते ही फना होंगे
अन्त है, तक़दीर है … यही मंज़िल है हमारी
आज ही बेहोश थे ... होश आया भी आज ही ...
होश भी ये आखिरी … और अंतिम है खुमारी
धीरे धीरे साँसे भी ... हो रही हैं धीमी
अभी तक था बंधन ... अब स्वछन्द हो रही हैं
अधखुली सी आँखों में ... मायूसी नहीं है बिलकुल
चमक रही हैं आज वो ... पर अब बंद हो रही हैं
जब था उठा सवाल ... बेचैनी ही बेचैनी
अब चेहरे पर शिकन नहीं ... ना कोई मलाल है
चैन की है रौशनी ... ठहराव ही ठहराव है
अब सवाल के उठने का ... न कोई सवाल है......
अब सवाल के उठने का ... न कोई सवाल है.......
( दानिशवरी* = बूद्धि , तर्क)
निराला हूँ मैं ... बड़ा लाजवाब सा भी
पूरा हूँ सच मैं ... हकीकत में अव्वल
परियों के शहर का ... रंगीन ख्वाब सा भी
मैं साथ ही हूँ जन्मा ... अपने सवाल के और
साथ ही हूँ रहता ... साथ ही बड़ा हुआ
दानिशवरी* ने आकर ... जब उसको पुकारा
मुझे पहचानना वो भूला ... अचानक उठ खड़ा हुआ
अब इधर उधर खोजता ... देखो थका जा रहा है
आवाज़ दे रहा है ... मुझे बदहवास होकर
है बाहर ही ढूंढता ... न झांके है भीतर
हैरान मैं, न पाता मुझे ... मेरे इतने पास होकर
…………………………………………
आज इस मुकाम पर... कुछ तो हुआ है
एकदम से, अचानक से ... क्या ऐसा घटा है
पर्दा हमारे बीच में ... जो हमेशा ही पड़ा था
बिलकुल भी नहीं है … एकदम से हटा है
मैं, तुम की छुट्टी … न मेरा, न तेरा
हम का अहम् का ... मूल्य नहीं अब रह गया
द्वन्द पूरे जीवन का ... जो जमता जा रहा था
एक पल में पिघला ... एक पल में बह गया
मुश्किल से मिले हम ... मिलते ही फना होंगे
अन्त है, तक़दीर है … यही मंज़िल है हमारी
आज ही बेहोश थे ... होश आया भी आज ही ...
होश भी ये आखिरी … और अंतिम है खुमारी
धीरे धीरे साँसे भी ... हो रही हैं धीमी
अभी तक था बंधन ... अब स्वछन्द हो रही हैं
अधखुली सी आँखों में ... मायूसी नहीं है बिलकुल
चमक रही हैं आज वो ... पर अब बंद हो रही हैं
जब था उठा सवाल ... बेचैनी ही बेचैनी
अब चेहरे पर शिकन नहीं ... ना कोई मलाल है
चैन की है रौशनी ... ठहराव ही ठहराव है
अब सवाल के उठने का ... न कोई सवाल है......
अब सवाल के उठने का ... न कोई सवाल है.......
( दानिशवरी* = बूद्धि , तर्क)
Comments
Post a Comment