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Compensatory Enrichment of  'the ghazal' बेहद बासी और थकी थी ग़ज़ल उसमे कोई जान नहीं थी फिर मोहब्बत हुई चाहत परवान लेने लगी एक बार फिर से चाहत को मंज़िल ना मिली ख्वाहिशें पूरी न हुईं चाहत ने फिर दम तोड़ दिया चाहत ने 'जान' दे दी और ग़ज़ल में 'जान' फूँक दी ग़ज़ल शानदार हो गई ग़ज़ल 'जान' दार हो गई
जब से होश सम्भाला पाया यही तुम कुछ बताना चाहती हो मुझे कुछ समझाना चाहती हो कभी तो तुम्हारी परछाईं में भी  पैनापन दिखता था तल्खी और चुभन थी एहसास में कभी तुम ही धुंधली हो जाती थीं धुआँ धुँआ  सा था तुम्हारे अंदाज़ में चंद अल्फ़ाजो में समेटे थीं जाने कितने राज़ हमेशा चुप्पी ही सुनाई पड़ी तुम्हारी आवाज़ में पर तुम भी हो अजीब बताना भी चाहती हो वो भी पहेली बन कर कोशिशो के बावज़ूद तुम रहीं  दूर..... मेरी समझ से दूर.....  बहुत दूर  मुझे याद है मैं बदला, मौसम बदला तुम भी बदलीं तरन्नुम और तुक की शॉल पहनकर अपने अंदर मौसीकी भर ली कई नाज़ुक जज़्बात भरे हो मुझे समझने में आसानी ऐसे भी तुमने  कुछ हसीन हालात भरे खूबसूरत और दिलकश ग़ज़ल बनकर फासलों में भरी नज़दीकियाँ सफ़ेद कागज़ पर मेरे दिल के तुमने चमक भरी कई रंगीन दिन अो रात भरे रही जहाँ तक तुम्हे जानने की बात तो तुम वहीँ रहीं दूर..... मेरी समझ से दूर.....  बहुत दूर  हार न मानी तुमने खुद को विस्तार दिया बारीकियां भी दिख सकें तकलीफ के बिन...
जिस्म की मंज़िल,  मिटटी होना जिस्म की मंज़िल,  मर जाना रूह की मंज़िल,  सिर्फ रोशनी हो और उजली,  निखर  जाना जिस्म ही माने,  ऊँच नीच और जिस्म ही माने,  कायदे रूह की मजलिस,  सब एक बराबर सिर्फ रूहानी हैं,  वायदे जिस्म की चाहत,  उत्सव करना जिस्म की चाहत,  जश्न है रूह आप में,  ऊर्जा उत्सव फिर और का,  क्या प्रश्न है जिस्म का ज़र्रा,  ज़र्रा रोये जिस्म का ज़र्रा,  ज़र्रा बिलखे रूह का रेशा,  रेशा रोशन अपने रब से,  आ मिल के 
Dear Time, I know you are great healer but please don't meddle with memories of my mother. Please leave them untouched and undiluted and let me relive them again and again and again.........I hope you will understand. आज तो दिल भी भारी है मेरे सर के जैसा बालों में फिर से मेरे उंगलियाँ फिरा दो मम्मी  होने लगी हैं धुँधली  अब मिटने सी लगी हैं एक बार फिर से थोड़ी यादें बिखरा दो मम्मी इतनी भी क्या थी जल्दी जाने की छोड़कर सबको कैसे मिलोगी फिर से कोई तो मशविरा दो मम्मी पहले तो आतीं थीं अक्सर अब दिखती भी नहीं हो एक बार नींद में फिर से एक सपना गिरा दो मम्मी
मैं, हाँ,  मैं  ही जवाब हूँ ... शांत हूँ  गम्भीर हूँ निराला  हूँ मैं ...  बड़ा लाजवाब सा भी पूरा हूँ सच मैं  ... हकीकत में अव्वल परियों के शहर का ...  रंगीन  ख्वाब सा भी मैं साथ ही हूँ  जन्मा ... अपने सवाल के और साथ ही  हूँ रहता ... साथ ही बड़ा हुआ दानिशवरी*  ने आकर ... जब उसको पुकारा मुझे पहचानना वो भूला ... अचानक उठ खड़ा हुआ अब इधर उधर खोजता ...  देखो थका  जा  रहा है आवाज़ दे रहा है ...  मुझे बदहवास होकर है बाहर ही ढूंढता ... न झांके है भीतर हैरान मैं, न पाता मुझे ... मेरे इतने पास होकर ………………………………………… आज इस मुकाम पर... कुछ तो हुआ है एकदम से,  अचानक से ...  क्या  ऐसा घटा है पर्दा हमारे बीच में ... जो हमेशा ही पड़ा था बिलकुल भी नहीं है …  एकदम से हटा है मैं, तुम की छुट्टी … न मेरा, न तेरा हम का अहम् का ... मूल्य नहीं अब  रह गया द...
एक सवाल था अकेला था अलबेला था अपने साथी अपने हमनफ़स अपने जवाब की  तलाश में घूम रहा था एक ही धुन थी उसको पा लेना उसी में झूम रहा था कोशिशो को लगातार बार बार नाकामी तो मिलती थी पर जवाब नहीं मिल रहा था थक गया था अब वो बदन भी टूट रहा था अभी तक जकड़े हुए था हौसला शायद अब कुछ हिस्सा छूट रहा था धीरे धीरे रास्ते में कुछ और लोग मिले सब थके से निराश से होश सबके खस्ताहाल थे वो भी कुछ ढूंढ ही  रहे थे वो सब भी सवाल थे  पहले एक सवाल था........ अकेला था ....... अब कई सवाल थे.……  मेला था.……  जवाब का अब भी दूर दूर तक कुछ पता न था.…………………   
सुन लो क्या कहती है,   मगर याद ये  रखना नहीं माननी कोई भी,   इसकी बात है है निशा ये मायावी,   राका है ये सूने सन्नाटे से सनी हुई,   एक रात है कस कर शिकंजा शक का,   तुम्हारी सोच पर छल्ला बन छलावों का,   तुम  पर गिरेगी स्याह रह जाएंगी सारी,   अनमनी आनाकानियां उजले फैसलों में भी तुम्हारे,    ये स्याही  भरेगी उठते ही शिकायत कर देना,   सवेरे से जाकर कैसे ये रोज़  लगाती रात,  घिनौनी घात है यदि चाहो तो कर देना तुम   माफ़ भी इसको फितरत के फंदे में फंसी,   आखिर बेचारी रात है