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कितनी आसानी से सीख गया था, तुमने कपड़ों पर मुगरी चलाते चलाते सिखा दिया था मुझे कापी पर चार सवाल तुम लिखती मैं झट से उन्हें लगा कर तुम्हे दिखा देता बस पता ही नहीं चला और जोड़ना आ गया मुझे एरोप्लेन की स्पेलिंग जब सीखी थी तुमसे कई दिन तक उसी प्लेन में बैठकर उड़ता ही रहा घमंड के आसमान में कितनी आसानी से सिखा दिया था तुमने सब कुछ मुझको कोशिश करता हूँ सिखा दूँ वैसे ही अपने बच्चों को भी प्यार जो करता हूँ उनसे बहोत मैं जान तो तुम भी देती थी हम सब पर है न मम्मी... कभी कभी अब सोचता हूँ बिना आंसू बहाए अपने बच्चों से विदा लेना तो मैंने सीखा ही नहीं तुमसे तुम्हे तो मालूम था नहीं रहोगी साथ हमारे ज्यादा दिन तक कभी देखे नहीं आंसू तुम्हारे चेहरे पर फिर भी ज़रुरत पड़ेगी मुझे भी कभी न कभी इसकी जोड़ना तो सीखा दिया हँसी खेल में हँसते हँसते अपनों से घटना भी सीखा दो.... प्लीज़ मम्मी ....
गुमान इस बात का है  कि जीता हूँ उसूलों पे, ये बात और है, बदल देता हूँ अक्सर उनको।  
If you were not there, I would have been not at all troubled, but you are always there to provide a standard for comparison and make me  feel unwanted and undesirable. I don't want to improve on myself - I just want you to disappear....... तुम जब चलते हो, तो कायनात चलती है कारवां सा खुशियों का, बिन बुलाये चलता है मैं जब भी दूँ  आवाज़, सफर - ए - मुश्किल में भी एक परेशां गूँज  के सिवा, साथ कुछ आता ही नहीं तुम दमकते  हो, चमकती है तुम्हारी महफ़िल जिस शह पर रख दो हाथ तुम, रोशन हो उठती है मैं जब भी करूँ  कोशिश, कि चमकती लौ को पकड़ लूँ चंद फफोलों के सिवा, हाथ कुछ आता ही नहीं
 एक बार भी न हुए  मुखातिब जब हर  कोना घर का रोशन था ,  अब टूटे हुए मकान में आ कर क्यों रोज़ दिया जलाते हो। 
Run Baby Run.......But Please..... If You Run And Only Run....You Will Die Tired एक राह पकड़ कर, चलता है वो सीढ़ी दर सीढ़ी, चढ़ता है वो समय नहीं है, दायें बाएं का, बस आगे ही.. बढ़ता है वो रफ़्तार कहीं कम, हो न  जाए, फिक्र इसी की.. करता है वो छूटे साथी छूटे अपने, कर लेने को, पूरे  सपने पूरा ज़ोर, लगा कर भागा दिन में जगना, भी क्या जगना रातों में भी, था वो जागा बहोत दूर अब, आ निकला है पा जाने को, सब भरपूर टस से मस भी, हुई नहीं है मंज़िल अब भी, लगती दूर हाथ में थे  जो, पहले ही छोड़े ओझल हो गए , सारे  अपने आँख से आँसू झर झर,  झर झर साथ में ढलकेँ, सारे  सपने सब कुछ खोया पाया नहीं कुछ हाथ लगी है, सिर्फ निराशा आज थकन है, तन पर केवल भीतर मन में, घोर हताशा आज थकन है, तन पर केवल भीतर मन में, घोर हताशा
जब होती नहीं मयस्सर, लड़खड़ाते हो ज़मीन पर डगमगाते भी हो बिलकुल, रिन्दों की तरह सागर में उतरते ही,  चढ़ते हो आसमान में हवा से पेंच लड़ाते हो, परिंदो की  तरह
है पता, नहीं बदलोगे ज़िद भी रहेगी क़ायम हक़ भी नहीं है तुम पर अब मैं ही बदल रहा हूँ हरदम गिरा हुआ था अब उठने सा लगा हूँ तुम्हे दिखती है लड़खड़ाहट पर मैं संभल रहा हूँ लो तुम भी लुत्फ़ ले लो तमाशे तुम्हे पसंद हैं तुम धू धू जल रहे हो  और मैं  उबल रहा हूँ  तेरी आरज़ू ने भींचा  तेरी ख्वाहिशों ने बाँधा  ओ जिस्म! गिरफ्त से तेरी  अब मैं निकल रहा हूँ  I have written few lines on perpetual tussle between mundane desires of physical body and intense pining for emancipation by sublime soul.....