कई  द्वंद मेरे अंदर कबड्डी खेलते रहते हैं। ये  सब निराकार स्वरुप को  इस कदर प्राप्त हैं कि लाख कोशिशों के बाद भी मैं इन्हे किसी निबंध या छंद में नहीं ढाल पता हूँ। फिर सोचता हूँ कि  अभी ये कच्चे हैं इनको इतनी जल्दी दुनिया के सामने लाना ठीक नहीं है। शायद जब ये पक जाएंगे तभी इन्हे मैं मूर्त रूप दे पाउँगा। अभी सिर्फ झाँकते रहते हैं बेबसी के परदे के पीछे से मन में ये सोचते हुए कि एक दिन अभिव्यक्ति के झरोखे से बाहर आकर स्वतंत्र हो जायेंगे और अपने आपको सब के समक्ष प्रस्तुत कर पाएंगे। पता नहीं वो दिन कब आएगा  फिलहाल तो मेरी स्थिति गूंगे के गुड़ जैसी हो गयी है पर  मैं प्रतीक्षा करूंगा . …

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