कई द्वंद मेरे अंदर कबड्डी खेलते रहते हैं। ये सब निराकार स्वरुप को इस कदर प्राप्त हैं कि लाख कोशिशों के बाद भी मैं इन्हे किसी निबंध या छंद में नहीं ढाल पता हूँ। फिर सोचता हूँ कि अभी ये कच्चे हैं इनको इतनी जल्दी दुनिया के सामने लाना ठीक नहीं है। शायद जब ये पक जाएंगे तभी इन्हे मैं मूर्त रूप दे पाउँगा। अभी सिर्फ झाँकते रहते हैं बेबसी के परदे के पीछे से मन में ये सोचते हुए कि एक दिन अभिव्यक्ति के झरोखे से बाहर आकर स्वतंत्र हो जायेंगे और अपने आपको सब के समक्ष प्रस्तुत कर पाएंगे। पता नहीं वो दिन कब आएगा फिलहाल तो मेरी स्थिति गूंगे के गुड़ जैसी हो गयी है पर मैं प्रतीक्षा करूंगा . …
ताज़ा ताज़ा था सबेरा ज़िंदादिल उजाला था बात बात पर होता हंसना हर अरमान निकाला था घंटे बीते ,समय कुछ निकला आ गयी दोपहर अलसायी सी ऊपर नीचे, गर्मी राहत थी धूप पर बदली छायी सी वक़्त का चलना ज़ारी है अब समय बड़ा ही भारी है चलो समेटो जल्दी जल्दी अब शाम होने वाली है ये जिया है हमने दिन भर वो सिर्फ झांकी सा रह जायेगा माना पाया काफी कुछ पर कुछ बाक़ी सा रह जायेगा घिरेगा अँधेरा रात होगी कल तक ना कोई बात होगी हमारी भी आँखे बंद होंगी अंत में सो ही जायेंगे पर अभी तो आँखे खोल लो सिर्फ शाम होने वाली है
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