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क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं ? सफर जहाँ से शुरू हुआ था पहुँच गया हूँ उसी जगह पर बाल खुजाते सोच रहा हूँ फिर से क्या शुरुआत करूँ मैं? क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं ? क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं ? तुम तो सच्चे हीरे सरीखे मैं पथरीले कंकड़ जैसा जब  तुम उलझन में पड़े हुए हो तब अपनी फिर क्या बात करूँ मैं क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं ?
... पर मन उदास  है मेरा सोचकर कि दुःख   को जाना होगा ख़ुशी जो आ रही है जाते हुए कितना दुखी लग रहा है हमेशा साथ दिया है चिपका रहा है साये की तरह मुझसे रहना दूभर हो जाएगा इसके बिना पर ऐ 'दुःख' ज्यादा दुखी मत हो मैंने ये भी सुना है ज्यादा दिन टिकती नहीं है ये 'ख़ुशी'
कैसे करूँगा सामना  कोहरे से  इसी सोच विचार में लीन  अथक श्रम किया है मैंने  पर सोच अभी भी दीन  कभी न कर पाया फैसला आज तो कुछ कर जाना है  कर के PG मुझको भी  धुंध से पार पाना है  बहोत घबराया सा  लग रहा था  आज का आसमान  अस्त व्यस्त, अस्थिर, अकुलाया सा  किसी MBBS की तरह 
कितनी आसानी से सीख गया था, तुमने कपड़ों पर मुगरी चलाते चलाते सिखा दिया था मुझे कापी पर चार सवाल तुम लिखती मैं झट से उन्हें लगा कर तुम्हे दिखा देता बस पता ही नहीं चला और जोड़ना आ गया मुझे एरोप्लेन की स्पेलिंग जब सीखी थी तुमसे कई दिन तक उसी प्लेन में बैठकर उड़ता ही रहा घमंड के आसमान में कितनी आसानी से सिखा दिया था तुमने सब कुछ मुझको कोशिश करता हूँ सिखा दूँ वैसे ही अपने बच्चों को भी प्यार जो करता हूँ उनसे बहोत मैं जान तो तुम भी देती थी हम सब पर है न मम्मी... कभी कभी अब सोचता हूँ बिना आंसू बहाए अपने बच्चों से विदा लेना तो मैंने सीखा ही नहीं तुमसे तुम्हे तो मालूम था नहीं रहोगी साथ हमारे ज्यादा दिन तक कभी देखे नहीं आंसू तुम्हारे चेहरे पर फिर भी ज़रुरत पड़ेगी मुझे भी कभी न कभी इसकी जोड़ना तो सीखा दिया हँसी खेल में हँसते हँसते अपनों से घटना भी सीखा दो.... प्लीज़ मम्मी ....
गुमान इस बात का है  कि जीता हूँ उसूलों पे, ये बात और है, बदल देता हूँ अक्सर उनको।  
If you were not there, I would have been not at all troubled, but you are always there to provide a standard for comparison and make me  feel unwanted and undesirable. I don't want to improve on myself - I just want you to disappear....... तुम जब चलते हो, तो कायनात चलती है कारवां सा खुशियों का, बिन बुलाये चलता है मैं जब भी दूँ  आवाज़, सफर - ए - मुश्किल में भी एक परेशां गूँज  के सिवा, साथ कुछ आता ही नहीं तुम दमकते  हो, चमकती है तुम्हारी महफ़िल जिस शह पर रख दो हाथ तुम, रोशन हो उठती है मैं जब भी करूँ  कोशिश, कि चमकती लौ को पकड़ लूँ चंद फफोलों के सिवा, हाथ कुछ आता ही नहीं
 एक बार भी न हुए  मुखातिब जब हर  कोना घर का रोशन था ,  अब टूटे हुए मकान में आ कर क्यों रोज़ दिया जलाते हो।